शुक्रवार, अगस्त 31, 2007

बिजली सप्‍लाई फिर चरमराई

बिजली सप्‍लाई फिर चरमराई

मुरैना 31 अगस्‍त । पिछले दस रोज से फिर चम्‍बल अंचल की बिजली गुल है । हालात बिजली कटौती के कुछ ऐसे हैं कि कहो तो सारा दिन बिजली न आवे और कहो तो सारी रात अंधेरा कायम रहे । अभी पिछले चार रोज से तो हालात ये चल रहे हैं कि न रात में बिजली न दिन में । यानि बिजली कटौती इतनी सीरियस कि नान स्‍टाप डे एण्‍ड नाइट ब्‍लैक आउट ।

हालांकि 26 जुलाई से म.प्र. विद्युत वितरण कम्‍पनी के इस विशेष कटौती कार्यक्रम की विधिवत कोई घोषणा नहीं की गयी है और न इसे किसी नियमित चक्र में चलाया जाता है । यह बाकायदा अघोषित अनियमित और बेकाबू होती है ।

चम्बल में विद्युत सप्लाई पूर्णत: ध्वस्त: लगातार तीन दिनों तक ब्लैक आउट

कहाँ तक बयां करें हालात ए गुलिस्तां, यहाँ हर शाख पे उल्लू बैठा है

मुरैना 9 अगस्त 07 ! अंततोगत्वा पिछले 26 जुलाई से चम्बल घाटी में कहर मचा रही बिजली व्यवस्था अपने चरम पर आकर पूरे तीन दिनों के लिये पूर्णत: ठप्प हो ही गयी !

उल्लेखनीय है कि विगत 26 जुलाई 07 से चम्बल घाटी की बिजली सप्लाई पूरी तरह चरमरा गयी थी और दिन में पीक वर्किंग टाइम में लगभग 6-7 घएटे तथा रात में करीब 3-4 घण्टे की बेहिसाब अनाप शनाप कटौती चल रही थी, जिसका न समय तय था न कोई घोषणा ही इस मुतल्लिक जारी हुयी थी !

उधर दूसरी ओर सरकार दावा दर दावा ठोकने में लगी थी कि हम बहुत ज्यादा बिजली पैदा कर रहे हैं और अब कोई बिजली संकट नहीं है ! जबकि सच यह है कि चम्बल में धुंआधार कटौती चल रही थी !

अभी हाल ही में दो बड़े बिजली उत्पादन के अडडे जहाँ उदघाटित हुये हैं जिसमें एक लालकृष्ण आडवाणी जी ने किया वहीं दूसरा मुरैना के ऐन निकट ही ग्वालियर जिले में केन्द्रीय मंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने किया ! जिसमें दावा यह था कि म.प्र. विशेषकर चम्बल ग्वालियर की बिजली समस्या अब पूर्णत: समाप्त !

उधर भगवान की दया से प्रदेश में बरसात भी अच्छी भली चल रही है, बाढ़ आ रही है, बांधो के इमरजेन्सी गेट खोल कर जरूरत से ज्यादा इकठठा हुआ पानी निकालना पड़ रहा है !

फिर भी बिजली नहीं होना जहाँ हैरत अंगेज और गजब की जादूगिरी है वहीं कुछ चौंकाने वाले सवालों की भी जन्मदाता ! मसलन बिना बिजली मिले म.प्र. की जनता अरबों रूपया की बिल भरपाई वर्ष सनृ 2000 से करती आ रही है ! उल्लेखनीय है कि प्रदेश में एवरेज बिलर्स की संख्या 70 फीसदी है, जिन्हें बिजली मिले या न मिले एक निश्चित औसत राशि बिजली विभाग को देनी ही पड़ती है ! और यह राशि प्रतिमाह करोड़ों रू में और वर्ष 2000 से अब तक अरबों रू में पहुँच चुकी है !

जहाँ सरकार बिजली चोरी और जनता को चोर ठहराने में कोई कसर बकाया नहीं रखती वही अब यह सवाल भी जोरदार है कि बिना बिजली दिये की गयी अरबों रू की यह वसूली क्या नाहक नहीं है ? और क्या सरकार चोर नहीं है ? जिसने जनता की जेब पर डाका डाला है ! सरकार में यदि भलमनसाहत है तो पहले तो उनका पैसा लौटाये जिन्होंने इतने वर्ष तक बिना बिजली मिले भी पूरा बिल भुगतान किया है, उनकी बिजली तो कटी लेकिन बिलों में कटौती या उनकी धन वापसी की बात अभी तक क्यों नहीं हुयी ! यह सवाल यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर सरकार को जनता को चोर कहने से पहले अनिवार्यत: देना होगा, तभी जनता के गले बात उतरेगी, वरना जनता आपको चोर कहती रहेगी, और आप जनता को !

विगत सोमवार 6 अगस्त से 8 अगस्त जो चम्बल में बिजली सप्लाई का जो कहर हुआ वह न केवल शर्मनाक बल्कि संभवत: म.प्र. के इतिहास में पहली बार हुआ जबरदस्त बलैक आउट है ! जिसमें 6 अगस्त सुबह से लेकर सारे दिन और सारी रात फिर 7 अगस्त को सारा दिन और सारी रात फिर 8 अगस्त को दोपहर 12 बजे तक लगातार सप्लाई ठप्प यानि पूर्णत: बन्द यानि ब्लैकआउट ! फिर दोबारा 8 अगस्त को शाम 4 बजे से रात 7:45 बजे तक पुन: सप्लाई बन्द ! गजब, अदभुत, चमात्कारिक, वाह क्या कहने ! बिजली वाले हुये या अलाउददीन के चिराग के जिन्न !

अब इसमें लोग कह रहे थे कि भईया आरक्षण की भर्ती है, आरक्षण का स्टाफ है तो यह तो होना ही है , अब ऐसी अवस्था में यदि लोग ऐसा कहते हैं तो हम पूछते हैं कि क्या गलत कहते हैं ! आरक्षण के नाम पर अयोग्य लोगों या कम योग्य लोगों के सहारे ऐसे संवेदलशील टैक्नीकल काम छोड़े जायेंगे तो यह तो होगा ही ! अव्वल तो वे कुछ जानते ही नहीं, दूसरे हराम की चाट पंजीरी का ऐसा स्वाद उनके मुँह लगा है कि, सरकार बाद में बिजली बेच पायेगी वे यहीं फैक्ट्रयों और इण्डस्ट्रियों में जम कर बिजली बेच देते हैं, उनके बैंक बैलेन्स और कोठीयों की लम्बाई चौड़ाई तो लगभग यही कहानी कहती है ! वहीं दूसरी ओर कुछ लोग यह भी कहते हैं कि बजली वालों को चोर और डकैतों से हफ्ता वसूली मिलती है, और कब कब कहाँ की बिजली गुल की जायेगी इसकी खबर चोरों डकैतों को रहती है और बिजली विभाग के गुप्त शिडयूल के अनुसार ही उनका गुप्त शिडयूल चलता है ! अगर लोग ऐसा कहते हैं, तो अब लोग क्या गलत कहते हैं ?  

उल्लेखनीय है कि मुरैना और भिण्ड दोनों ही जिलों में बिजली को लेकर अभी हाल ही पिछले दस पन्द्रह दिनों में भारी जनआक्रोश और उपद्रव हुआ जहाँ महिलाओं ने जगह जगह कई आन्दोलन किये और पुतले फूंके, बिजली वालों की धुनाई पिटाई कर डाली वहीं लगता है सारी चम्बल घाटी में महिलाओं की फौज मानो कमर कसकर विद्रोह और विरोध पर उतारू है और प्रदर्शन, धरना, विरोध से लेकर धुनाई पिटाई भी उनके आन्दोलन का हिस्सा है, मजे की बात ये है कि उनके साथ कोई राजनीतिक दल नहीं हैं, जनता अपनी लड़ाई खुद लड़ रही है !

पिछले सप्ताह म.प्र. शासन के पूर्व कांग्रेस मंत्री राकेश चौधरी को जरूर भिण्ड में बिजली समस्या को लेकर न केवल सड़कों पर आना पड़ा बल्कि भिण्ड कलेक्ट्रेट की तालाबन्दी करना पड़ी, उनके तालाबन्दी आन्दोलन को जनता का इतना व्यापक समर्थन मिला कि भिण्ड की सडृकों पर जनता समाये नहीं बन रही थी, उन्होंने न केवल कुशलता और सफलतापूर्वक कलेक्ट्रेट भिण्ड की तालाबन्दी कर दी बल्कि जनता के हीरो भी बन गये ! यह भी स्मरणीय है कि भिण्ड के वर्तमान भाजपा विधायक नरेन्द्र सिंह कुशवाह भी बिल्कुल ठीक इसी तरह विधायक बने ! बस फर्क यह था कि उस समय कांग्रेस की सरकार थी और इसी बिजली के लिये आन्दोलन नरेन्द्र सिंह कुशवाह ने इसी तरह जनता को साथ लेकर किया था ! और कई बिजली वालों की पिटाई धुनाई की थी, और पहले वे अखबारों की सुर्खियां बनें, फिर भिण्ड के विधायक ! तब राकेश चौधरी भिण्ड के विधायक और बाद में सरकार के मंत्री थे ! अब बिल्कुल वही सिचुएशन एकदम उल्टी है ! यानि आप समझ ही गये होंगे कि इसका अर्थ क्या है !

मुरैना की स्थिति थोड़ी भिन्न है, विशुध्द रूप से आरक्षित सीट रहने और भाजपा का अखण्ड गढ़ रहने से यहाँ जननेतृत्व का अभाव है, यहाँ के विधायक, सांसद जननेता की परिभाषा से परे हैं , चाटुकारिता और कृपालुता के भरोसे राजनीति करने वाले नेताओं के साये में मुरैना जिला की जनता को अपनी लड़ाई खुद लड़ना पड़ती है, लड़ती आयी है, और लड़ भी रही है ! नेता, विधायक, मंत्री, सांसद सब अपनी अपनी पीठ खुद ही थपथपाते रहते हैं, थपथपा रहे हैं, उनका हमेशा ही खैरियत अलार्म और ''जी सर'' ''यस सर'' तकिया कलाम चालू रहता है !       

जनता चोर और वे साहूकार, वाह भई वाह उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे ! लोकतंत्र में जनता कोतवाल होती है, और सरकार चोर, लोकतंत्र का मतलब तो यही है भईया ! जनता अधिकारी होती है, और सरकारी लोग उसके नौकर यानि सेवक यानि पब्लिक सर्वेण्ट ! मगर यहाँ तो उल्टी ही गंगा बह रही है !  

क्या कहता है बिजली विभाग  ?

आज के दैनिक भास्कर में बिजली विभाग का स्पष्टीकरण यानि पक्ष प्रकाशित है, हम दैनिक भास्कर से साभार इसे यहाँ दे रहे हैं - महकमे के बिजली के तार चार पाँच जगह पर टूट गये थे, रात का समय होने की वजह से तारों को जोड़ा नहीं जा सके, हालांकि बुधवार की दोपहर को शहर की आपूर्ति को सामान्य बना लिया गया है- पी.के.सिंह, एस.ई. विद्युत मण्डल मुरैना !

क्या उक्त पक्ष स्पष्टीकरण से कुछ जाहिर नहीं होता - 1. ये लोग 24 घण्टे के पूर्णकालिक कर्मचारी यानि लोकसेवक यानि पब्लिक सर्वेण्ट नहीं हैं 2. बिजली के तार टूटना एक सामान्य और आम बात है जो सनृ 2000 से आज तक रोजाना हो रही है 3. ट्रान्सफार्मर फुंकना आम बात है जो सन 2000 से रोजाना फुंक रहे हैं 4. रात के वक्त बिजली महकमा काम नहीं करता 5. चार पाँच जगह के बिजली के तार तीन दिनों में जोड़ पाते हैं बेचारे 6. दारू पीकर होश में आने में कर्मचारीयों को तीन दिन से ज्यादा भी लग जाते हैं !

 

गुरुवार, अगस्त 09, 2007

कहाँ तक बयां करें हालात ए गुलिस्तां, यहाँ हर शाख पे उल्लू बैठा है

चम्बल में विद्युत सप्लाई पूर्णत: ध्वस्त: लगातार तीन दिनों तक ब्लैक आउट

कहाँ तक बयां करें हालात ए गुलिस्तां, यहाँ हर शाख पे उल्लू बैठा है

मुरैना 9 अगस्त 07 ! अंततोगत्वा पिछले 26 जुलाई से चम्बल घाटी में कहर मचा रही बिजली व्यवस्था अपने चरम पर आकर पूरे तीन दिनों के लिये पूर्णत: ठप्प हो ही गयी !

उल्लेखनीय है कि विगत 26 जुलाई 07 से चम्बल घाटी की बिजली सप्लाई पूरी तरह चरमरा गयी थी और दिन में पीक वर्किंग टाइम में लगभग 6-7 घएटे तथा रात में करीब 3-4 घण्टे की बेहिसाब अनाप शनाप कटौती चल रही थी, जिसका न समय तय था न कोई घोषणा ही इस मुतल्लिक जारी हुयी थी !

उधर दूसरी ओर सरकार दावा दर दावा ठोकने में लगी थी कि हम बहुत ज्यादा बिजली पैदा कर रहे हैं और अब कोई बिजली संकट नहीं है ! जबकि सच यह है कि चम्बल में धुंआधार कटौती चल रही थी !

अभी हाल ही में दो बड़े बिजली उत्पादन के अडडे जहाँ उदघाटित हुये हैं जिसमें एक लालकृष्ण आडवाणी जी ने किया वहीं दूसरा मुरैना के ऐन निकट ही ग्वालियर जिले में केन्द्रीय मंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने किया ! जिसमें दावा यह था कि म.प्र. विशेषकर चम्बल ग्वालियर की बिजली समस्या अब पूर्णत: समाप्त !

उधर भगवान की दया से प्रदेश में बरसात भी अच्छी भली चल रही है, बाढ़ आ रही है, बांधो के इमरजेन्सी गेट खोल कर जरूरत से ज्यादा इकठठा हुआ पानी निकालना पड़ रहा है !

फिर भी बिजली नहीं होना जहाँ हैरत अंगेज और गजब की जादूगिरी है वहीं कुछ चौंकाने वाले सवालों की भी जन्मदाता ! मसलन बिना बिजली मिले म.प्र. की जनता अरबों रूपया की बिल भरपाई वर्ष सनृ 2000 से करती आ रही है ! उल्लेखनीय है कि प्रदेश में एवरेज बिलर्स की संख्या 70 फीसदी है, जिन्हें बिजली मिले या न मिले एक निश्चित औसत राशि बिजली विभाग को देनी ही पड़ती है ! और यह राशि प्रतिमाह करोड़ों रू में और वर्ष 2000 से अब तक अरबों रू में पहुँच चुकी है !

जहाँ सरकार बिजली चोरी और जनता को चोर ठहराने में कोई कसर बकाया नहीं रखती वही अब यह सवाल भी जोरदार है कि बिना बिजली दिये की गयी अरबों रू की यह वसूली क्या नाहक नहीं है ? और क्या सरकार चोर नहीं है ? जिसने जनता की जेब पर डाका डाला है ! सरकार में यदि भलमनसाहत है तो पहले तो उनका पैसा लौटाये जिन्होंने इतने वर्ष तक बिना बिजली मिले भी पूरा बिल भुगतान किया है, उनकी बिजली तो कटी लेकिन बिलों में कटौती या उनकी धन वापसी की बात अभी तक क्यों नहीं हुयी ! यह सवाल यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर सरकार को जनता को चोर कहने से पहले अनिवार्यत: देना होगा, तभी जनता के गले बात उतरेगी, वरना जनता आपको चोर कहती रहेगी, और आप जनता को !

विगत सोमवार 6 अगस्त से 8 अगस्त जो चम्बल में बिजली सप्लाई का जो कहर हुआ वह न केवल शर्मनाक बल्कि संभवत: म.प्र. के इतिहास में पहली बार हुआ जबरदस्त बलैक आउट है ! जिसमें 6 अगस्त सुबह से लेकर सारे दिन और सारी रात फिर 7 अगस्त को सारा दिन और सारी रात फिर 8 अगस्त को दोपहर 12 बजे तक लगातार सप्लाई ठप्प यानि पूर्णत: बन्द यानि ब्लैकआउट ! फिर दोबारा 8 अगस्त को शाम 4 बजे से रात 7:45 बजे तक पुन: सप्लाई बन्द ! गजब, अदभुत, चमात्कारिक, वाह क्या कहने ! बिजली वाले हुये या अलाउददीन के चिराग के जिन्न !

अब इसमें लोग कह रहे थे कि भईया आरक्षण की भर्ती है, आरक्षण का स्टाफ है तो यह तो होना ही है , अब ऐसी अवस्था में यदि लोग ऐसा कहते हैं तो हम पूछते हैं कि क्या गलत कहते हैं ! आरक्षण के नाम पर अयोग्य लोगों या कम योग्य लोगों के सहारे ऐसे संवेदलशील टैक्नीकल काम छोड़े जायेंगे तो यह तो होगा ही ! अव्वल तो वे कुछ जानते ही नहीं, दूसरे हराम की चाट पंजीरी का ऐसा स्वाद उनके मुँह लगा है कि, सरकार बाद में बिजली बेच पायेगी वे यहीं फैक्ट्रयों और इण्डस्ट्रियों में जम कर बिजली बेच देते हैं, उनके बैंक बैलेन्स और कोठीयों की लम्बाई चौड़ाई तो लगभग यही कहानी कहती है ! वहीं दूसरी ओर कुछ लोग यह भी कहते हैं कि बजली वालों को चोर और डकैतों से हफ्ता वसूली मिलती है, और कब कब कहाँ की बिजली गुल की जायेगी इसकी खबर चोरों डकैतों को रहती है और बिजली विभाग के गुप्त शिडयूल के अनुसार ही उनका गुप्त शिडयूल चलता है ! अगर लोग ऐसा कहते हैं, तो अब लोग क्या गलत कहते हैं ? 

उल्लेखनीय है कि मुरैना और भिण्ड दोनों ही जिलों में बिजली को लेकर अभी हाल ही पिछले दस पन्द्रह दिनों में भारी जनआक्रोश और उपद्रव हुआ जहाँ महिलाओं ने जगह जगह कई आन्दोलन किये और पुतले फूंके, बिजली वालों की धुनाई पिटाई कर डाली वहीं लगता है सारी चम्बल घाटी में महिलाओं की फौज मानो कमर कसकर विद्रोह और विरोध पर उतारू है और प्रदर्शन, धरना, विरोध से लेकर धुनाई पिटाई भी उनके आन्दोलन का हिस्सा है, मजे की बात ये है कि उनके साथ कोई राजनीतिक दल नहीं हैं, जनता अपनी लड़ाई खुद लड़ रही है !

पिछले सप्ताह म.प्र. शासन के पूर्व कांग्रेस मंत्री राकेश चौधरी को जरूर भिण्ड में बिजली समस्या को लेकर न केवल सड़कों पर आना पड़ा बल्कि भिण्ड कलेक्ट्रेट की तालाबन्दी करना पड़ी, उनके तालाबन्दी आन्दोलन को जनता का इतना व्यापक समर्थन मिला कि भिण्ड की सडृकों पर जनता समाये नहीं बन रही थी, उन्होंने न केवल कुशलता और सफलतापूर्वक कलेक्ट्रेट भिण्ड की तालाबन्दी कर दी बल्कि जनता के हीरो भी बन गये ! यह भी स्मरणीय है कि भिण्ड के वर्तमान भाजपा विधायक नरेन्द्र सिंह कुशवाह भी बिल्कुल ठीक इसी तरह विधायक बने ! बस फर्क यह था कि उस समय कांग्रेस की सरकार थी और इसी बिजली के लिये आन्दोलन नरेन्द्र सिंह कुशवाह ने इसी तरह जनता को साथ लेकर किया था ! और कई बिजली वालों की पिटाई धुनाई की थी, और पहले वे अखबारों की सुर्खियां बनें, फिर भिण्ड के विधायक ! तब राकेश चौधरी भिण्ड के विधायक और बाद में सरकार के मंत्री थे ! अब बिल्कुल वही सिचुएशन एकदम उल्टी है ! यानि आप समझ ही गये होंगे कि इसका अर्थ क्या है !

मुरैना की स्थिति थोड़ी भिन्न है, विशुध्द रूप से आरक्षित सीट रहने और भाजपा का अखण्ड गढ़ रहने से यहाँ जननेतृत्व का अभाव है, यहाँ के विधायक, सांसद जननेता की परिभाषा से परे हैं , चाटुकारिता और कृपालुता के भरोसे राजनीति करने वाले नेताओं के साये में मुरैना जिला की जनता को अपनी लड़ाई खुद लड़ना पड़ती है, लड़ती आयी है, और लड़ भी रही है ! नेता, विधायक, मंत्री, सांसद सब अपनी अपनी पीठ खुद ही थपथपाते रहते हैं, थपथपा रहे हैं, उनका हमेशा ही खैरियत अलार्म और ''जी सर'' ''यस सर'' तकिया कलाम चालू रहता है !      

जनता चोर और वे साहूकार, वाह भई वाह उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे ! लोकतंत्र में जनता कोतवाल होती है, और सरकार चोर, लोकतंत्र का मतलब तो यही है भईया ! जनता अधिकारी होती है, और सरकारी लोग उसके नौकर यानि सेवक यानि पब्लिक सर्वेण्ट ! मगर यहाँ तो उल्टी ही गंगा बह रही है ! 

क्या कहता है बिजली विभाग  ?

आज के दैनिक भास्कर में बिजली विभाग का स्पष्टीकरण यानि पक्ष प्रकाशित है, हम दैनिक भास्कर से साभार इसे यहाँ दे रहे हैं - महकमे के बिजली के तार चार पाँच जगह पर टूट गये थे, रात का समय होने की वजह से तारों को जोड़ा नहीं जा सके, हालांकि बुधवार की दोपहर को शहर की आपूर्ति को सामान्य बना लिया गया है- पी.के.सिंह, एस.ई. विद्युत मण्डल मुरैना !

क्या उक्त पक्ष स्पष्टीकरण से कुछ जाहिर नहीं होता - 1. ये लोग 24 घण्टे के पूर्णकालिक कर्मचारी यानि लोकसेवक यानि पब्लिक सर्वेण्ट नहीं हैं 2. बिजली के तार टूटना एक सामान्य और आम बात है जो सनृ 2000 से आज तक रोजाना हो रही है 3. ट्रान्सफार्मर फुंकना आम बात है जो सन 2000 से रोजाना फुंक रहे हैं 4. रात के वक्त बिजली महकमा काम नहीं करता 5. चार पाँच जगह के बिजली के तार तीन दिनों में जोड़ पाते हैं बेचारे 6. दारू पीकर होश में आने में कर्मचारीयों को तीन दिन से ज्यादा भी लग जाते हैं !

चम्बल में विद्युत सप्लाई पूर्णत: ध्वस्त: लगातार तीन दिनों तक ब्लैक आउट

चम्बल में विद्युत सप्लाई पूर्णत: ध्वस्त: लगातार तीन दिनों तक ब्लैक आउट

कहाँ तक बयां करें हालात ए गुलिस्तां, यहाँ हर शाख पे उल्लू बैठा है

मुरैना 9 अगस्त 07 ! अंततोगत्वा पिछले 26 जुलाई से चम्बल घाटी में कहर मचा रही बिजली व्यवस्था अपने चरम पर आकर पूरे तीन दिनों के लिये पूर्णत: ठप्प हो ही गयी !

उल्लेखनीय है कि विगत 26 जुलाई 07 से चम्बल घाटी की बिजली सप्लाई पूरी तरह चरमरा गयी थी और दिन में पीक वर्किंग टाइम में लगभग 6-7 घएटे तथा रात में करीब 3-4 घण्टे की बेहिसाब अनाप शनाप कटौती चल रही थी, जिसका न समय तय था न कोई घोषणा ही इस मुतल्लिक जारी हुयी थी !

उधर दूसरी ओर सरकार दावा दर दावा ठोकने में लगी थी कि हम बहुत ज्यादा बिजली पैदा कर रहे हैं और अब कोई बिजली संकट नहीं है ! जबकि सच यह है कि चम्बल में धुंआधार कटौती चल रही थी !

अभी हाल ही में दो बड़े बिजली उत्पादन के अडडे जहाँ उदघाटित हुये हैं जिसमें एक लालकृष्ण आडवाणी जी ने किया वहीं दूसरा मुरैना के ऐन निकट ही ग्वालियर जिले में केन्द्रीय मंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने किया ! जिसमें दावा यह था कि म.प्र. विशेषकर चम्बल ग्वालियर की बिजली समस्या अब पूर्णत: समाप्त !

उधर भगवान की दया से प्रदेश में बरसात भी अच्छी भली चल रही है, बाढ़ आ रही है, बांधो के इमरजेन्सी गेट खोल कर जरूरत से ज्यादा इकठठा हुआ पानी निकालना पड़ रहा है !

फिर भी बिजली नहीं होना जहाँ हैरत अंगेज और गजब की जादूगिरी है वहीं कुछ चौंकाने वाले सवालों की भी जन्मदाता ! मसलन बिना बिजली मिले म.प्र. की जनता अरबों रूपया की बिल भरपाई वर्ष सनृ 2000 से करती आ रही है ! उल्लेखनीय है कि प्रदेश में एवरेज बिलर्स की संख्या 70 फीसदी है, जिन्हें बिजली मिले या न मिले एक निश्चित औसत राशि बिजली विभाग को देनी ही पड़ती है ! और यह राशि प्रतिमाह करोड़ों रू में और वर्ष 2000 से अब तक अरबों रू में पहुँच चुकी है !

जहाँ सरकार बिजली चोरी और जनता को चोर ठहराने में कोई कसर बकाया नहीं रखती वही अब यह सवाल भी जोरदार है कि बिना बिजली दिये की गयी अरबों रू की यह वसूली क्या नाहक नहीं है ? और क्या सरकार चोर नहीं है ? जिसने जनता की जेब पर डाका डाला है ! सरकार में यदि भलमनसाहत है तो पहले तो उनका पैसा लौटाये जिन्होंने इतने वर्ष तक बिना बिजली मिले भी पूरा बिल भुगतान किया है, उनकी बिजली तो कटी लेकिन बिलों में कटौती या उनकी धन वापसी की बात अभी तक क्यों नहीं हुयी ! यह सवाल यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर सरकार को जनता को चोर कहने से पहले अनिवार्यत: देना होगा, तभी जनता के गले बात उतरेगी, वरना जनता आपको चोर कहती रहेगी, और आप जनता को !

विगत सोमवार 6 अगस्त से 8 अगस्त जो चम्बल में बिजली सप्लाई का जो कहर हुआ वह न केवल शर्मनाक बल्कि संभवत: म.प्र. के इतिहास में पहली बार हुआ जबरदस्त बलैक आउट है ! जिसमें 6 अगस्त सुबह से लेकर सारे दिन और सारी रात फिर 7 अगस्त को सारा दिन और सारी रात फिर 8 अगस्त को दोपहर 12 बजे तक लगातार सप्लाई ठप्प यानि पूर्णत: बन्द यानि ब्लैकआउट ! फिर दोबारा 8 अगस्त को शाम 4 बजे से रात 7:45 बजे तक पुन: सप्लाई बन्द ! गजब, अदभुत, चमात्कारिक, वाह क्या कहने ! बिजली वाले हुये या अलाउददीन के चिराग के जिन्न !

अब इसमें लोग कह रहे थे कि भईया आरक्षण की भर्ती है, आरक्षण का स्टाफ है तो यह तो होना ही है , अब ऐसी अवस्था में यदि लोग ऐसा कहते हैं तो हम पूछते हैं कि क्या गलत कहते हैं ! आरक्षण के नाम पर अयोग्य लोगों या कम योग्य लोगों के सहारे ऐसे संवेदलशील टैक्नीकल काम छोड़े जायेंगे तो यह तो होगा ही ! अव्वल तो वे कुछ जानते ही नहीं, दूसरे हराम की चाट पंजीरी का ऐसा स्वाद उनके मुँह लगा है कि, सरकार बाद में बिजली बेच पायेगी वे यहीं फैक्ट्रयों और इण्डस्ट्रियों में जम कर बिजली बेच देते हैं, उनके बैंक बैलेन्स और कोठीयों की लम्बाई चौड़ाई तो लगभग यही कहानी कहती है ! वहीं दूसरी ओर कुछ लोग यह भी कहते हैं कि बजली वालों को चोर और डकैतों से हफ्ता वसूली मिलती है, और कब कब कहाँ की बिजली गुल की जायेगी इसकी खबर चोरों डकैतों को रहती है और बिजली विभाग के गुप्त शिडयूल के अनुसार ही उनका गुप्त शिडयूल चलता है ! अगर लोग ऐसा कहते हैं, तो अब लोग क्या गलत कहते हैं ? 

उल्लेखनीय है कि मुरैना और भिण्ड दोनों ही जिलों में बिजली को लेकर अभी हाल ही पिछले दस पन्द्रह दिनों में भारी जनआक्रोश और उपद्रव हुआ जहाँ महिलाओं ने जगह जगह कई आन्दोलन किये और पुतले फूंके, बिजली वालों की धुनाई पिटाई कर डाली वहीं लगता है सारी चम्बल घाटी में महिलाओं की फौज मानो कमर कसकर विद्रोह और विरोध पर उतारू है और प्रदर्शन, धरना, विरोध से लेकर धुनाई पिटाई भी उनके आन्दोलन का हिस्सा है, मजे की बात ये है कि उनके साथ कोई राजनीतिक दल नहीं हैं, जनता अपनी लड़ाई खुद लड़ रही है !

पिछले सप्ताह म.प्र. शासन के पूर्व कांग्रेस मंत्री राकेश चौधरी को जरूर भिण्ड में बिजली समस्या को लेकर न केवल सड़कों पर आना पड़ा बल्कि भिण्ड कलेक्ट्रेट की तालाबन्दी करना पड़ी, उनके तालाबन्दी आन्दोलन को जनता का इतना व्यापक समर्थन मिला कि भिण्ड की सडृकों पर जनता समाये नहीं बन रही थी, उन्होंने न केवल कुशलता और सफलतापूर्वक कलेक्ट्रेट भिण्ड की तालाबन्दी कर दी बल्कि जनता के हीरो भी बन गये ! यह भी स्मरणीय है कि भिण्ड के वर्तमान भाजपा विधायक नरेन्द्र सिंह कुशवाह भी बिल्कुल ठीक इसी तरह विधायक बने ! बस फर्क यह था कि उस समय कांग्रेस की सरकार थी और इसी बिजली के लिये आन्दोलन नरेन्द्र सिंह कुशवाह ने इसी तरह जनता को साथ लेकर किया था ! और कई बिजली वालों की पिटाई धुनाई की थी, और पहले वे अखबारों की सुर्खियां बनें, फिर भिण्ड के विधायक ! तब राकेश चौधरी भिण्ड के विधायक और बाद में सरकार के मंत्री थे ! अब बिल्कुल वही सिचुएशन एकदम उल्टी है ! यानि आप समझ ही गये होंगे कि इसका अर्थ क्या है !

मुरैना की स्थिति थोड़ी भिन्न है, विशुध्द रूप से आरक्षित सीट रहने और भाजपा का अखण्ड गढ़ रहने से यहाँ जननेतृत्व का अभाव है, यहाँ के विधायक, सांसद जननेता की परिभाषा से परे हैं , चाटुकारिता और कृपालुता के भरोसे राजनीति करने वाले नेताओं के साये में मुरैना जिला की जनता को अपनी लड़ाई खुद लड़ना पड़ती है, लड़ती आयी है, और लड़ भी रही है ! नेता, विधायक, मंत्री, सांसद सब अपनी अपनी पीठ खुद ही थपथपाते रहते हैं, थपथपा रहे हैं, उनका हमेशा ही खैरियत अलार्म और ''जी सर'' ''यस सर'' तकिया कलाम चालू रहता है !      

जनता चोर और वे साहूकार, वाह भई वाह उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे ! लोकतंत्र में जनता कोतवाल होती है, और सरकार चोर, लोकतंत्र का मतलब तो यही है भईया ! जनता अधिकारी होती है, और सरकारी लोग उसके नौकर यानि सेवक यानि पब्लिक सर्वेण्ट ! मगर यहाँ तो उल्टी ही गंगा बह रही है ! 

क्या कहता है बिजली विभाग  ?

आज के दैनिक भास्कर में बिजली विभाग का स्पष्टीकरण यानि पक्ष प्रकाशित है, हम दैनिक भास्कर से साभार इसे यहाँ दे रहे हैं - महकमे के बिजली के तार चार पाँच जगह पर टूट गये थे, रात का समय होने की वजह से तारों को जोड़ा नहीं जा सके, हालांकि बुधवार की दोपहर को शहर की आपूर्ति को सामान्य बना लिया गया है- पी.के.सिंह, एस.ई. विद्युत मण्डल मुरैना !

क्या उक्त पक्ष स्पष्टीकरण से कुछ जाहिर नहीं होता - 1. ये लोग 24 घण्टे के पूर्णकालिक कर्मचारी यानि लोकसेवक यानि पब्लिक सर्वेण्ट नहीं हैं 2. बिजली के तार टूटना एक सामान्य और आम बात है जो सनृ 2000 से आज तक रोजाना हो रही है 3. ट्रान्सफार्मर फुंकना आम बात है जो सन 2000 से रोजाना फुंक रहे हैं 4. रात के वक्त बिजली महकमा काम नहीं करता 5. चार पाँच जगह के बिजली के तार तीन दिनों में जोड़ पाते हैं बेचारे 6. दारू पीकर होश में आने में कर्मचारीयों को तीन दिन से ज्यादा भी लग जाते हैं !

बिजली न होने से बीच शहर में ढाई लाख की चोरी

बिजली न होने से बीच शहर में ढाई लाख की चोरी

भिण्ड ! 9 अगस्त 07 ! सैनिक कालोनी भिण्ड में रहने वाले, सिकरौदा निवासी जुहाल सिंह परमार के यहाँ बीती रात शहर में बिजली न होने के कारण, परिवार के सारे सदस्य रात को छत पर सो रहे थे !

इस दरम्यान अज्ञात चोर घर के मुख्य दरवाजे से बगल में लगी खिड़की की जाली को निकाल कर घर में घुसे और मुख्य कमरे से होते हुये बेडरूम में पहुँचे और गृह स्वामी की नकदी और बहू के सारे गहने जेवर समेट ले गये !

सुबह घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पहुँची कोतवाली पुलिस ने पंचनामा बनाया और अग्रिम कार्यवाही शुरू की, ! पुलिस का कहना है चोरों की सरगर्मी से तलाश शुरू कर दी गयी है ! पुलिस के आकलन के अनुसार चोरी गये माल मशरूका की कीमत लगभग ढाई लाख रूपये आकी गयी है !

मोहल्ले वालों का कहना है कि पिछले दो महीने से इलाके का ट्रान्सफार्मर फुंका पड़ा है इसलिये पिछले दो माह से मोहल्ले में बिजली नहीं है ! शिकायतें खूब की गयीं मगर कोई सुनता नहीं हैं ! काश अगर बिजली होती तो यह वारदात नहीं हो पाती !

समाचार लिखे जाने तक जनता में भारी रोष और आक्रोश व्याप्त था !                

 

सोमवार, जुलाई 30, 2007

महिला राष्‍ट्रपति, महिला कलेक्‍टर और मुल्जिम बनीं अधिकार मांगती महिलायें

महिला राष्‍ट्रपति, महिला कलेक्‍टर और मुल्जिम बनीं अधिकार मांगती महिलायें

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

मुरैना 30 जुलाई । अब इसे विडम्‍बना कहें या दुर्योग । भारत की प्रथम महिला राष्‍ट्रपति हो, जिले की पहली महिला कलेक्‍टर (श्रीमती कैरेलिन खोंग्‍वार देशमुख इन दिनों मुरैना कलेक्‍टर हैं ) हो । और हक मांगती महिलाओं को मुल्जिम बना दिया जाये और अपराधीयों के मानिन्‍द थोकबन्‍द एफ.आई.आर. दर्ज कर दी जायें ।

पिछले हफते यह वाकया मुरैना शहर की आम व गरीब बस्‍ती की महिलाओं के साथ गुजरा ।

बात कुछ यूं है कि जहॉं श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह राष्‍ट्रपति बनीं वहीं मुरैना के गोपालपुरा क्षेत्र जहॉं बिजली की किल्‍लत थी यानि लगभग एक महीने से ट्रान्‍सफार्मर फुंका पड़ा था, और शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं हो रही थी । सो महिलाओं की टोली ने बिजलीघर पर जाकर शिकायत शिकवा शुरू किया,धरना प्रदर्शन किया और बन गईं मुल्जिम ।

पिछले कुछ सालों से बिजलीघर का आलम ये है कि कोई शिकायत फरियाद या ज्ञापन लेकर जाये तो अव्‍वल तो उसकी पावती ही नहीं दी जायेगी और यदि आपने फयूज ऑफ कॉल रजिस्‍टर मांगने की जुर्रत की तो आपकी खैर नहीं, और यदि आपने सामूहिक ज्ञापन देने या चेंटने की जुर्रत की तो समझिये । कि आप इस देश के सबसे बड़े अपराधी हैं । यानि आपके खिलाफ बिजली वाले तुरन्‍त एक एफ.आई.आर. पुलिस में लिखा देंगें जिसका खास आपराध मजमून शासकीय कार्य में बाधा, गालीगलौज, और मारपीट होगा, इसके साथ ही एक और खास टैक्‍नॉलॉजी है कि एफ.आई.आर. किसी हरिजन कर्मचारी या हरिजन अधिकारी के नाम से भेजी जायेगी जिससे हरिजन एक्‍ट भी लग सके, पिछले चार सालों सें बिजलीघर के इस नये नुस्‍खे से इतना जरूर हुआ है कि लोगों ने बिजली मॉंगना और बिजली के आन्‍दोलन बन्‍द कर दिये हैं । मुरैना जिला की कोतवालीयों  में ऐसे बिजली मामलों की भरमार है ।

पिछले हफते मुरैना में महिलाओं के विरूद्ध थोकबन्‍द दर्ज की गयी एफ.आई.आर. ने जहॉं भारत के अन्‍तर्मन को झकझोर कर लोकतंत्र की चूलें हिला दीं हैं । वहीं गरीब हक मांगते किसानों पर लठठ बरसाना, उनके विरूद्ध हक मांगने को आपराध में तब्‍दील करना, हक मांगने पर महिलाओं को अपराधी बना देना, मुझे लगता है इससे तो अंग्रेजी राज बेहतर था और इस देश को स्‍वतंत्रता न मिली होती तो अच्‍छा था ।

आन्‍दोलन और अहिंसात्‍मक तरीके से शान्तिपूर्ण प्रदर्शन, असहयोग, और प्रतीकात्‍मक विरोध, अधिकारों की मांग करना आदि इस देश को महात्‍मा गांधी द्वारा सिखाये गये फार्मूले हैं ।

गांधी के पथ पर चलने वाले लोग तब अँग्रेजी हुकूमत के जलजले के शिकार होते थे और अब अपनी ही सरकार और अपनी ही पुलिस के । हालांकि वर्तमान में मुरैना का पुलिस महकमा विशेषकर शहर मुरैना और ग्रामीण मुरैना इन दिनों कुछ ठीकठाक है और सन 2001 और 2002 की तरह लॅबे समय बाद अच्‍छे अफसरों की यूनिट काम कर रही है । उल्‍लेखनीय है 2001-2002 में डॉ. रमन सिंह जो कि उस समय यहॉं एडीशनल एस.पी. थे और अजीत केसरी मुरैना के कलेक्‍टर थे, मेरी नजर में एक गजब की अच्‍छी यूनिट उस समय यहॉं बन पड़ी थी, हालांकि उस समय एस.पी. ठीक नहीं था, और डॉ.रमन सिंह जिस पर लोग बहुत विश्‍वास करते थे और उनकी गजब की ईमानदारी और कर्तव्‍य परायणता से लोगों का विश्‍वास पुलिस पर जम गया था, ऐसा ही लगभग कलेक्‍टर अजीत केसरी के बारे में था । यद्यपि एडीशनल एस.पी. ज्‍यादा कुछ स्‍वतंत्र कार्य नहीं कर पाता है लेकिन फिर भी वह जो कर सकते थे वह उन्‍होंने किया और लोगों के दिल पर पुलिस का सही अर्थ अंकित किया । मगर तुर्रा ये कि वे यहॉं से चले गये और पुलिस फिर बदनाम हो गयी ।

फिर लम्‍बे समय बाद रवि गुप्‍ता जरूर फिर अपनी छाप बना पाये लेकिन डकैत समस्‍या या यूं कहिये कि नेताओं के लिये सहज व सहूलियते वाला न होने से उन्‍हें नेताओं का कोपभाजन हो कर जाना पड़ा । फिर योगेश चौधरी डकैत समस्‍या या बढ़ते अपराधों के नियंत्रण में असफलता का दाग लेकर यहॉं से गये हालांकि उनकी कार्यप्रणाली का एक भाग कुछ ठीक था किन्‍तु वे यहॉं के लोगों में अपने पराये का अन्‍तर नहीं कर पाये और भेद नीति में असफल हो कर अपने जौहर नहीं दिखा पाये ।

अब जो यूनिट काम कर रही है, उसमें कलेक्‍टर श्रीमती कैरेलिन खोंग्‍वार देशमुख की आजकल ठीकठाक छवि है उनकी कार्यप्रणाली भी लगभग दुरूस्‍त ही जान पड़ती है, उनसे मिलने या किसी काम का मौका तो नहीं पड़ा लेकिन ओवरव्‍यू अभी तक ठीक है, वहीं मुरैना एस.पी.डॉ. हरी सिंह यादव हनुमान भक्‍त और उनकी यूनिट सी.एस.पी. जयवीर सिंह भदौरिया, टी.आई. के.डी.सोनकिया, डी.एस. परिहार, सी.एस.पी. राजेश मिश्रा की जुगलबन्‍दी बड़ी कमाल की है, मुझे न विश्‍वास था न ऐसी उम्‍मीद फिर भी गजब का काम कर दिखाया है, हॉं एक शिकायत जरूर अक्‍सर आती है कि थानों में अभी भी कायमीयां नहीं होती, फरियादी आज भी बेइज्‍जती और अनसुनेपन के शिकार हैं ।

हॉं तो मुख्‍य बात ये है कि एक बढि़या यूनिट और महिला राष्‍ट्रपति एवं महिला कलेक्‍टर के जमाने में महिलाओं के खिलाफ एफ.आई.आर. ये बात कुछ गले उतर नहीं पा रही ।

वैसे भी मध्‍यक्षेत्र विद्युत वितरण कम्‍पनी एक इनकार्पोरेटेड कम्‍पनी (कम्‍पनी अधिनियम 1956) है न कि शासन का विभाग । फिर शासकीय कार्य में बाधा का मामला कैसे दर्ज हो गया, कैसे लोक अभियोजक ने इसे अदालत में जाने दिया और कैसे अदालत ने इसे प्रोसीड कर दिया, कमाल की बात है । मैंने कई मामले मुरैना जिला की कोतवालीयों में ऐसे देखे हैं तहॉं फरियादी या तो कोई निजी फर्म या संस्‍था या कम्‍पनी है यानि जैसे बैंक या सहकारी समिति और इन मामलों में बाकायदा लोकसेवक की तरह निजी मामलों को दर्ज किया गया और शासकीय कार्य में बाधा पहले ही झटके में दर्ज की गयी, न केवल दर्ज की गयी बल्कि उस पर चालान यानि द.प्र.सं.की धारा 173 में अंतिम रिपोर्ट भी इसी प्रकार प्रस्‍तुत हुयी, मामले अदालत में सुने भी गये, और फैसले भी हुये मगर यह जिक्र तक नहीं हुआ कि शासकीय कार्य में बाधा तब बनती जब किसी सरकारी काम में बाधा होती । यानि किसी सरकारी काम का जिक्र तक नहीं आया । अदालत ने भी इन मामलों पर कभी कोई टिप्‍पणी नहीं की, और कईयों को सजायें या जुर्माने ठोक दिये ।

हालांकि पुलिस और अदालत में अभी काफी कुछ गड़बड़ है, मगर अफसोस यह है कि उस वक्‍त वकील क्‍या कर रहे होते हैं, बुनियादी खामियों को या तो वे अदालत में कहते नहीं या फिर उन्‍हें अदालत सुनती नहीं, फिर भला जबरदस्‍ती कैसे कानून और पुलिस पर लोग यकीन करें । ऐसे चिचित्र अन्‍यायों, विरोधाभासों और विडम्‍बनाओं की एक बहुत बड़ी फेहरिस्‍त मेरे पास है जहॉं पुलिस और अदालतें ही कानून से परे हो गयीं हैं ।

बात लगभग एक साल पुरानी है, एक जज ने मुरैना की एक अदालत में फरियादी या उसके वकील से यह तक नहीं पूछा कि खेत की जमीन को कालोनी के रूप में कैसे पिछले बीस साल से बेच रहे हो, कैसे प्‍लाटिंग कर रहे हो, क्‍या नगरपालिका या ग्राम पंचायत में इसे कालोनी के रूप में अधिसूचित कर दिया है या नहीं और उस फर्जी कालोनी को यानि उसके फरियादी पक्ष को सी.पी.सी. की धारा 39(3) का स्‍टे आनन फानन में कालोनी मान कर एक झटके में जारी कर दिया, ऊपर से तुर्रा ये कि आवेदन जिस जगह की स्‍टे के लिये लगाया गया, उसमें नक्‍शा दूसरी जगह का था और फरियादी के पास रजिस्‍ट्री दूसरी जगह की, मजे की बात ये कि दोनों नक्‍शे उसमें लगाये गये और दोनों अलग अलग । यह घटना प्रकरण क्रमांक 23/06/ इ.दी. न्‍यायालय प्रभाकान्‍त शुक्‍ला की है ।

खैर एक और महिला हैं किरण बेदी वे भी खूब चिल्‍लाचोट कर रहीं हैं, वहॉं भी आलम यही है राष्‍ट्रपति महिला और मुख्‍यमंत्री भी महिला और महिला बेदी पर हो गया अन्‍याय, एक महिला बेदी को मिल गया न्‍याय और एक के साथ हो गया अन्‍याय । वैसे उनके बारे में आज वायस आफ अमेरिका ने तगड़ा समाचार दिया है नीचे यह उसे यथावत दे रहे हैं । -

भारत सरकार पर लैंगिक भेदभाव का आरोप

वायस औफ़ अमेरिका  ▪ Hindi

जब भारत की पहली महिला राष्ट्रपति ने अपना पद संभाला तो कहा गया कि इससे देश की लाखों महिलाओं का मनोबल ऊंचा उठा है । लेकिन इसके ठीक बाद एक वरिष्ठ महिला पुलिस अधिकारी को उच्च पद पर नियुक्ति से वंचित कर दिया गया । इस घटना की वजह से देश में इस बात पर बहस छिड़ गई है कि देश में अभी भी लैंगिक भेदभाव बरकरार है । नई दिल्ली से अंजना पसरीचा की रिपोर्ट-

कई लोगों के लिए हाल में भारत के राष्ट्रपति पद पर 72-वर्षीय प्रतिभा पाटिल का चुना जाना देश में महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रतीक बन गया है । वह ऐसे देश की राष्ट्रपति बनी है, जहां अभी भी व्यापक पैमाने पर भेदभाव बना हुआ है ।

लेकिन ठीक जिस दिन सुश्री पाटिल को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई गई, उसी दिन सरकार ने दिल्ली पुलिस के प्रमुख के पद पर नियुक्ति में एक महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी की अनदेखी कर दी और उनकी जगह उनके कनिष्ठ सहयोगी को उस पर बैठा दिया । सरकार ने इतना ही कहा है कि यह एक प्रशासनिक फैसला है । 

सरकार के इस कदम से एक विवाद खड़ा हो गया है । हाल के महीनों में यह तीसरी घटना है, जब सरकार के प्रमुख पदों पर पुरुषों को बिठाने के लिए महिलाओं की अनदेखी की गई । प्रमुख नौकरशाह वीणा सिकरी और रेवा नायर को वरिष्ठता के आधार पर क्रमशः विदेश सचिव और कबीना सचिव बनाया जाना चाहिए था, लेकिन उनकी अनदेखी कर दी गई ।

महिला संगठनों ने इस पर भारी ऐतराज जताया है । उनका कहना है कि लैंगिक पूर्वाग्रह की वजह से सरकार में काबिल महिला अधिकारियों की उपेक्षा की जा रही है ।

सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी ने कहा है कि एक महिला को राष्ट्रपति बनाने की जो उपलब्धि मिली थी, वह व्यर्थ हो गई ।

सुश्री कुमारी ने कहा- हमारा मानना है कि राष्ट्रपति पद पर एक महिला की नियुक्ति सोच-समझकर नहीं की गई है । यह सिर्फ राजनीतिक मजबूरी की वजह से की गई । मैं नहीं समझती की सत्ता में बैठे लोग भारत में वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाना चाहते हैं । मैं यह समझ रही हूं कि व्यवस्था अभी भी महिलाओं के लिए जगह छोड़ने को तैयार नहीं है ।

किरण बेदी देश की पहली महिला पुलिस अधिकारी है । कड़ी और स्वतंत्र विचारों वाली होने के कारण उनकी चारों तरफ प्रशंसा हुई है । कई तरह की जिम्मेदारियां उन्हें दी गईं, जहां उन्होंने अपनी छाप छोड़ी । किरण बेदी ने पुलिस प्रमुख के पद से वंचित करने के सरकार के फैसले का विरोध किया है ।

सुश्री बेदी ने कहा कि जो कुछ हुआ है, उससे बहुत ही दुखद संदेश जाता है और हम पहाड़ों से जंग लड़ रहे हैं । व्यवस्था की जीत इसलिए हुई, क्योंकि व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं है ।

महिला संगठनों ने सरकार में महिलाओं की बहुत कम भागीदारी का सवाल उठाया है । उनके एक आंकड़े के अनुसार संसद सदस्यों में उनकी संख्या 8 प्रतिशत, नौकरशाही में 15 प्रतिशत और न्यायपालिका में 3 प्रतिशत ही है । ये आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि भारत में अभी भी मर्दों का ही दबदबा है ।

उनका कहना है कि संसद में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीट आरक्षित करने की कोशिशों में सांसदों ने बार-बार अड़ंगा लगाया है, हालांकि देश की दोनों प्रमुख पार्टियां यह कह रही हैं कि वे इसके पक्ष में हैं ।

ऐसा नहीं है कि भारत में महिलाएं बड़े पदों पर आसीन नहीं हुई हैं । इंदिरा गांधी 1966 से 1977 और 1980 से 1984 तक करीब 14 साल तक देश की प्रधानमंत्री थीं । उनकी बहू सेनिया गांधी देश की सत्ताधारी पार्टी, कांग्रेस एवं उसके गठबंधन की मुखिया है । लेकिन आलोचकों का कहना है कि वे इतने बड़े पदों तक इसलिए पहुंची, क्योंकि वे एक शक्तिशाली राजनीतिक खानदान से जुड़ी थीं ।